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*शनि द्वारा जनित विष योग* By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब*विष योग - जब भी किसी जातक की कुंडली में शनि और चन्द्रमा तथा शनि और सूर्य एक साथ विराजमान होते है ये विष योग की उत्पत्ति करते है ।जिसके कारन कई कष्टो का कारन जातक के जीवन में बन जाता है।* *आयु , मृत्यु, भय, दुख, अपमान, रोग, दरिद्रता, दासता, बदनामी, विपत्ति, निन्दित कार्य, नीच लोगों से सहायता, आलस, कर्ज, लोहा, कृषि उपकरण तथा बंधन का विचार शनि ग्रह से होता है।**अपने अशुभ कारकत्व के कारण शनि ग्रह को पापी तथा अशुभ ग्रह कहा जाता है। परंतु यह पूर्णतया सत्य नहीं है। वृष, तुला, मकर और कुंभ लग्न वाले जातक के लिए शनि ऐश्वर्यप्रद, धनु व मीन लग्न में शुभकारी तथा अन्य लग्नों में वह मिश्रित या अशुभ फल देता है।शनि पूर्वजन्म में किये गये कर्मों का फल इस विषयोग की स्थिति ।**कुण्डली में विषयोग का निर्माण शनि और चन्द्र की स्थिति के या शनि सूर्य आधार पर बनता है।शनि और चन्द्र की जब युति होती है ।तब अशुभ विषयोग बनता है।**लग्न में चन्द्र पर शनि की तीसरी,सातवीं अथवा दशवी दृष्टि होने पर यह योग बनता है।कर्क राशि में शनि पुष्य नक्षत्र में हो और चन्द्रमा मकर राशि में श्रवण नक्षत्र का हो और दोनों का परिवर्तन योग हो या फिर चन्द्र और शनि विपरीत स्थिति में हों और दोनों की एक दूसरे पर दृष्टि हो तब विषयोग की स्थिति बनती है।**सूर्य अष्टम भाव में, चन्द्र षष्टम में और शनि द्वादश में होने पर भी इस योग का विचार किया जाता है।**कुण्डली में आठवें स्थान पर राहु हो और शनि मेष, कर्क, सिंह या वृश्चिक लग्न में हो तो विषयोग भोगना होता है.विषयोग चंद्र-शनि से बनता है।**दांपत्य जीवन तब नष्ट होता है।जब सप्तम भाव या सप्तमेश से युति दृष्टि संबंध हो।जैसे सप्तम भाव में धनु राशि हो और सप्तम भाव में शनि हो और लग्न में गुरु-चंद्र हो तब यह दोष लगेगा या शनि-चंद्र सप्तम भाव में हो तब दांपत्य जीवन को प्रभावित करेगा।**इसी प्रकार विस्फोटक योग शनि-मंगल से बनता है। यदि शनि-मंगल की युति सप्तम भाव में हो या शनि सप्तम भाव में हो व मंगल की दृष्टि पड़ती हो तो या शनि सप्तम भाव में बैठे मंगल पर दृष्टिपात करता हो या सप्तमेश शनि-मंगल से पीड़ित हो तो दांपत्य जीवन नष्ट होता है। अन्यत्र हो तो दांपत्य जीवन नष्ट नहीं होता।**जन्म पत्रिका में कितने भी शुभ ग्रह हों और इन योगों में से कोई एक भी योग बनता है तो सभी शुभ प्रभावों को खत्म कर देता है। यदि उपरोक्त योग जहाँ बन रहे हैं,उन पर यदि शुभ ग्रह जैसे गुरु की दृष्टि हो तो कुछ अशुभ परिणाम कम कर देता है।**एक उदाहरण कुंडली से जानें कि उच्च का चंद्रमा एक युवती के लग्‍न में है।अतः युवती सुंदर तथा गौर वर्ण तो है।लेकिन इसका दांपत्य जीवन खराब है।**सप्तमेश शुक्र द्वादश भाव में अग्नि तत्व की राशि मेष में बैठा है अतः दांपत्य जीवन खराब है ।एवं शनि की दसवीं दृष्टि चंद्रमा पर पड़ रही है,जो विष योग बना रही है।**अतः इसका सारा जीवन दुख व अभावों में बीतेगा, वहीं इसकी पत्रिका में राहू व केतु मध्य सारे ग्रह होने से कालसर्प योग भी बन रहा है,जो कष्टों को और अधिक प्रभावित कर रहा है।लग्न पर शनि के अलावा किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी नहीं है।उदाहरण कुंडली से पता चलता है ।कि किस प्रकार विषयोग जीवन पर प्रभाव डालता है।**यदि शनि-मंगल या शनि-चंद्र की युति सप्तम भाव में हो या आपसी दृष्टि संबंध बनता हो तो निश्चित ही दांपत्य जीवन नरक बन जाता है।* *शनि-मंगल की युति यदि चतुर्थ या दशम भाव में बनती हो तो ऐसा जातक माता सुख से, परिवार से, जनता के बीच आदि कार्यों से हानि पाता है,उसी प्रकार दशम भाव में बनने वाला योग पिता से,राज्य से, नौकरी से, व्यापार से, राजनीति से आदि मामलों से हानि पाता हैं।* *ऐसा जातक नौकरी में भटकता रहता है,स्थानांतरण होते रहते हैं एवं अपने अधिकारियों से नहीं बनती। यदि शनि-मंगल की युति तृतीय भाव में हो तो भाइयों से नहीं बनती व मित्र भी दगा कर जाते हैं। साझेदारी में किए गए कार्यों में घाटा होता हैं।**सूर्य-चंद्र की युति सदैव अमावस्या को ही होती है, इसे अमावस्या योग की संज्ञा दी गई है, यह योग भी जिसकी पत्रिका में जिस भाव में बनेगा, उस भाव को कमजोर कर देगा।**अगर कोई नदी में कचरा या पूजन सामग्री फेंकता है उसे ज्योतिष के अनुसार विषयोग बनाता है।और धन का नुकसान उठाना पड़ता है।**विष योग किस प्रकार बनता है-**ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विषयोग तब बनता है जब वार और तिथि के मध्य विशेष योग बनता है।* *जैसे जब रविवार के दिन चतुर्थी तिथि पड़े तब इस योग का निर्माण होता है।**सोमवार का दिन हो और षष्टी तिथि पड़े तब यह अशुभ योग बनता है।**मंगलवार का दिन हो और तिथि हो सप्तमी, इस बार और तिथि के संयोग से भी विष योग बनता है।**द्वितीया तिथि जब बुधवार के दिन पड़े तब विष योग का निर्माण होता है।**अष्टमी तिथि हो और दिन हो गुरूवार का तो इस संयोग का फल विष योग होता है।**शुक्रवार के दिन जब कभी नवमी तिथि पड़ जाती है ।तब भी विष योग बनाता है।**शनिवार के दिन जब सप्तमी तिथि हो तब आपको कोई शुभ काम करने की इज़ाजत नहीं दी जाती है।क्योंकि यह अशुभ विष योग का निर्माण करती है।* *विषयोग में शनि चन्द्र की युति का फल-* *जिनकी कुण्डली में शनि और चन्द्र की युति प्रथम भाव में होती है वह व्यक्ति विषयोग के प्रभाव से अक्सर बीमार रहता है। व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी परेशानी आती रहती है।ये शंकालु और वहमी प्रकृति के होते हैं।**जिस व्यक्ति की कुण्डली में द्वितीय भाव में यह योग बनता है पैतृक सम्पत्ति से सुख नहीं मिलता है।**कुटुम्बजनों के साथ इनके बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.गले के ऊपरी भागों में इन्हें परेशानी होती है।नौकरी एवं कारोबार में रूकावट और बाधाओं का सामना करना होता है।**तृतीय स्थान में विषयोग सहोदरो के लिए अशुभ होता है।इन्हें श्वास सम्बन्धी तकलीफ का सामना करना होता है।**चतुर्थ भाव का विषयोग माता के लिए कष्टकारी होता है।अगर यह योग किसी स्त्री की कुण्डली में हो तो स्तन सम्बन्धी रोग होने की संभावना रहती है।जहरीले कीड़े मकोड़ों का भय रहता है।एवं गृह सुख में कमी आती है.**पंचम भाव में यह संतान के लिए पीड़ादायक होता है।शिक्षा पर भी इस योग का विपरीत असर होता है।**षष्टम भाव में यह योग मातृ पक्ष से असहयोग का संकेत होता है।चोरी एवं गुप्त शत्रुओं का भय भी इस भाव में रहता है।**सप्तम स्थान कुण्डली में विवाह एवं दाम्पत्य जीवन का घर होता है।इस भाव मे विषयोग दाम्पत्य जीवन में उलझन और परेशानी खड़ा कर देता है।**पति पत्नी में से कोई एक अधिकांशत: बीमार रहता है.ससुराल पक्ष से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.साझेदारी में व्यवसाय एवं कारोबार नुकसान देता है।**अष्टम भाव में चन्द्र और शनि की युति मृत्यु के समय कष्ट का सकेत माना जाता है.इस भाव में विषयोग होने पर दुर्घटना की संभावना बनी रहती है।नवम भाव का विषयोग त्वचा सम्बन्धी रोग देता है।यह भाग्य में अवरोधक और कार्यों में असफलता दिलाता है।**दशम भाव में यह पिता के पक्ष से अनुकूल नहीं होता.सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद करवाता है।नौकरी में परेशानी और अधिकारियों का भय रहता है.एकादश भाव में अंतिम समय कष्टमय रहता है।और संतान से सुख नहीं मिलता है।कामयाबी और सच्चे दोस्त से व्यक्ति वंचित रहता है।**द्वादश भाव में यह निराशा, बुरी आदतों का शिकार और विलासी एवं कामी बनाता है.इस प्रकार ये ख़राब योगो में गिना जाता है। जब भी जातक इस विष योग की संज्ञा से कष्ट उठा रहा हे तब उसके है तो हमेंशा ही चन्द्र - शनि का विषयोग वालो को चावल तथा काले उड़द की खिचड़ी सुखी पूर्णिमा को बाटनी चाहिए।*

*शनि द्वारा जनित विष योग*    
By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

*विष योग - जब भी किसी जातक की कुंडली में शनि और चन्द्रमा तथा शनि और सूर्य एक साथ विराजमान होते है ये विष योग की उत्पत्ति करते है ।जिसके कारन कई कष्टो का कारन जातक के जीवन में बन जाता है।*

 *आयु , मृत्यु, भय, दुख, अपमान, रोग, दरिद्रता, दासता, बदनामी, विपत्ति, निन्दित कार्य, नीच लोगों से सहायता, आलस, कर्ज, लोहा, कृषि उपकरण तथा बंधन का विचार शनि ग्रह से होता है।*

*अपने अशुभ कारकत्व के कारण शनि ग्रह को पापी तथा अशुभ ग्रह कहा जाता है। परंतु यह पूर्णतया सत्य नहीं है। वृष, तुला, मकर और कुंभ लग्न वाले जातक के लिए शनि ऐश्वर्यप्रद, धनु व मीन लग्न में शुभकारी तथा अन्य लग्नों में वह मिश्रित या अशुभ फल देता है।शनि पूर्वजन्म में किये गये कर्मों का फल इस विषयोग की स्थिति ।*

*कुण्डली में विषयोग का निर्माण शनि और चन्द्र की स्थिति के या शनि सूर्य आधार पर बनता है।शनि और चन्द्र की जब युति होती है ।तब अशुभ विषयोग बनता है।*

*लग्न में चन्द्र पर शनि की तीसरी,सातवीं अथवा दशवी दृष्टि होने पर यह योग बनता है।कर्क राशि में शनि पुष्य नक्षत्र में हो और चन्द्रमा मकर राशि में श्रवण नक्षत्र का हो और दोनों का परिवर्तन योग हो या फिर चन्द्र और शनि विपरीत स्थिति में हों और दोनों की एक दूसरे पर दृष्टि हो तब विषयोग की स्थिति बनती है।*

*सूर्य अष्टम भाव में, चन्द्र षष्टम में और शनि द्वादश में होने पर भी इस योग का विचार किया जाता है।*

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*दांपत्य जीवन तब नष्ट होता है।जब सप्तम भाव या सप्तमेश से युति दृष्टि संबंध हो।जैसे सप्तम भाव में धनु राशि हो और सप्तम भाव में शनि हो और लग्न में गुरु-चंद्र हो तब यह दोष लगेगा या शनि-चंद्र सप्तम भाव में हो तब दांपत्य जीवन को प्रभावित करेगा।*

*इसी प्रकार विस्फोटक योग शनि-मंगल से बनता है। यदि शनि-मंगल की युति सप्तम भाव में हो या शनि सप्तम भाव में हो व मंगल की दृष्टि पड़ती हो तो या शनि सप्तम भाव में बैठे मंगल पर दृष्टिपात करता हो या सप्तमेश शनि-मंगल से पीड़ित हो तो दांपत्य जीवन नष्ट होता है। अन्यत्र हो तो दांपत्य जीवन नष्ट नहीं होता।*

*जन्म पत्रिका में कितने भी शुभ ग्रह हों और इन योगों में से कोई एक भी योग बनता है तो सभी शुभ प्रभावों को खत्म कर देता है। यदि उपरोक्त योग जहाँ बन रहे हैं,उन पर यदि शुभ ग्रह जैसे गुरु की दृष्टि हो तो कुछ अशुभ परिणाम कम कर देता है।*

*एक उदाहरण कुंडली से जानें कि उच्च का चंद्रमा एक युवती के लग्‍न में है।अतः युवती सुंदर तथा गौर वर्ण तो है।लेकिन इसका दांपत्य जीवन खराब है।*

*सप्तमेश शुक्र द्वादश भाव में अग्नि तत्व की राशि मेष में बैठा है अतः दांपत्य जीवन खराब है ।एवं शनि की दसवीं दृष्टि चंद्रमा पर पड़ रही है,जो विष योग बना रही है।*

*अतः इसका सारा जीवन दुख व अभावों में बीतेगा, वहीं इसकी पत्रिका में राहू व केतु मध्य सारे ग्रह होने से कालसर्प योग भी बन रहा है,जो कष्टों को और अधिक प्रभावित कर रहा है।लग्न पर शनि के अलावा किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी नहीं है।उदाहरण कुंडली से पता चलता है ।कि किस प्रकार विषयोग जीवन पर प्रभाव डालता है।*

*यदि शनि-मंगल या शनि-चंद्र की युति सप्तम भाव में हो या आपसी दृष्टि संबंध बनता हो तो निश्चित ही दांपत्य जीवन नरक बन जाता है।* 

*शनि-मंगल की युति यदि चतुर्थ या दशम भाव में बनती हो तो ऐसा जातक माता सुख से, परिवार से, जनता के बीच आदि कार्यों से हानि पाता है,उसी प्रकार दशम भाव में बनने वाला योग पिता से,राज्य से, नौकरी से, व्यापार से, राजनीति से आदि मामलों से हानि पाता हैं।*

 *ऐसा जातक नौकरी में भटकता रहता है,स्थानांतरण होते रहते हैं एवं अपने अधिकारियों से नहीं बनती। यदि शनि-मंगल की युति तृतीय भाव में हो तो भाइयों से नहीं बनती व मित्र भी दगा कर जाते हैं। साझेदारी में किए गए कार्यों में घाटा होता हैं।*

*सूर्य-चंद्र की युति सदैव अमावस्या को ही होती है, इसे अमावस्या योग की संज्ञा दी गई है, यह योग भी जिसकी पत्रिका में जिस भाव में बनेगा, उस भाव को कमजोर कर देगा।*

*अगर कोई नदी में कचरा या पूजन सामग्री फेंकता है उसे ज्योतिष के अनुसार विषयोग बनाता है।और धन का नुकसान उठाना पड़ता है।*

*विष योग किस प्रकार बनता है-*

*ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विषयोग तब बनता है जब वार और तिथि के मध्य विशेष योग बनता है।*

 *जैसे जब रविवार के दिन चतुर्थी तिथि पड़े तब इस योग का निर्माण होता है।*

*सोमवार का दिन हो और षष्टी तिथि पड़े तब यह अशुभ योग बनता है।*

*मंगलवार का दिन हो और तिथि हो सप्तमी, इस बार और तिथि के संयोग से भी विष योग बनता है।*

*द्वितीया तिथि जब बुधवार के दिन पड़े तब विष योग का निर्माण होता है।*

*अष्टमी तिथि हो और दिन हो गुरूवार का तो इस संयोग का फल विष योग होता है।*

*शुक्रवार के दिन जब कभी नवमी तिथि पड़ जाती है ।तब भी विष योग बनाता है।*

*शनिवार के दिन जब सप्तमी तिथि हो तब आपको कोई शुभ काम करने की इज़ाजत नहीं दी जाती है।क्योंकि यह अशुभ विष योग का निर्माण करती है।*                      
  
 *विषयोग में शनि चन्द्र की युति का फल-*

 *जिनकी कुण्डली में शनि और चन्द्र की युति प्रथम भाव में होती है वह व्यक्ति विषयोग के प्रभाव से अक्सर बीमार रहता है। व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी परेशानी आती रहती है।ये शंकालु और वहमी प्रकृति के होते हैं।*

*जिस व्यक्ति की कुण्डली में द्वितीय भाव में यह योग बनता है पैतृक सम्पत्ति से सुख नहीं मिलता है।*

*कुटुम्बजनों के साथ इनके बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.गले के ऊपरी भागों में इन्हें परेशानी होती है।नौकरी एवं कारोबार में रूकावट और बाधाओं का सामना करना होता है।*

*तृतीय स्थान में विषयोग सहोदरो के लिए अशुभ होता है।इन्हें श्वास सम्बन्धी तकलीफ का सामना करना होता है।*

*चतुर्थ भाव का विषयोग माता के लिए कष्टकारी होता है।अगर यह योग किसी स्त्री की कुण्डली में हो तो स्तन सम्बन्धी रोग होने की संभावना रहती है।जहरीले कीड़े मकोड़ों का भय रहता है।एवं गृह सुख में कमी आती है.*

*पंचम भाव में यह संतान के लिए पीड़ादायक होता है।शिक्षा पर भी इस योग का विपरीत असर होता है।*

*षष्टम भाव में यह योग मातृ पक्ष से असहयोग का संकेत होता है।चोरी एवं गुप्त शत्रुओं का भय भी इस भाव में रहता है।*

*सप्तम स्थान कुण्डली में विवाह एवं दाम्पत्य जीवन का घर होता है।इस भाव मे विषयोग दाम्पत्य जीवन में उलझन और परेशानी खड़ा कर देता है।*

*पति पत्नी में से कोई एक अधिकांशत: बीमार रहता है.ससुराल पक्ष से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.साझेदारी में व्यवसाय एवं कारोबार नुकसान देता है।*

*अष्टम भाव में चन्द्र और शनि की युति मृत्यु के समय कष्ट का सकेत माना जाता है.इस भाव में विषयोग होने पर दुर्घटना की संभावना बनी रहती है।नवम भाव का विषयोग त्वचा सम्बन्धी रोग देता है।यह भाग्य में अवरोधक और कार्यों में असफलता दिलाता है।*

*दशम भाव में यह पिता के पक्ष से अनुकूल नहीं होता.सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद करवाता है।नौकरी में परेशानी और अधिकारियों का भय रहता है.एकादश भाव में अंतिम समय कष्टमय रहता है।और संतान से सुख नहीं मिलता है।कामयाबी और सच्चे दोस्त से व्यक्ति वंचित रहता है।*

*द्वादश भाव में यह निराशा, बुरी आदतों का शिकार और विलासी एवं कामी बनाता है.इस प्रकार ये ख़राब योगो में गिना जाता है। जब भी जातक इस विष योग की संज्ञा से कष्ट उठा रहा हे तब उसके है तो हमेंशा ही चन्द्र - शनि का विषयोग वालो को चावल तथा काले उड़द की खिचड़ी सुखी पूर्णिमा को बाटनी चाहिए।*

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*****प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत |****** बाल वनिता महिला आश्रम  ज्योतिष में वर्णित प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत के द्वारा हम यह जानने में समर्थ होते है कि किसी प्रेमी- प्रेमिका का प्यार विवाह में परिणत होगा या नहीं। वस्तुतः “प्रेमी और प्रेमिका” के मध्य प्रेम की पराकाष्ठा का विवाह में तब्दील होना ही प्रेम विवाह(Love Marriage) है या यूं कहे कि जब लड़का और लड़की में परस्पर प्रेम होता है तदनन्तर जब दोनों एक दूसरे को जीवन साथी के रूप में देखने लगते है और वही प्रेम जब विवाह के रूप में परिणत हो जाता है तो हम उसे प्रेम-विवाह कहते है। प्रेम विवाह हेतु निर्धारित भाव एवं ग्रह वहीं सभी ग्रहो को भी विशेष कारकत्व प्रदान किया गया है। यथा “शुक्र ग्रह” को प्रेम तथा विवाह का कारक माना गया है। स्त्री की कुंडली में “ मगल ग्रह ” प्रेम का कारक माना गया है। ज्योतिषशास्त्र में सभी विषयों के लिए निश्चित भाव निर्धारित किया गया है लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, एकादश, तथा द्वादश भाव को प्रेम-विवाह का कारक भाव माना गया है यथा — लग्न भाव — जातक स्वयं। पंचम भाव — प्रेम या प्यार का स्थान। सप्तम...

#केतु_का_उपाय By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब।।#जिन्दा_मच्छली_कटने_से_बचा_लो।।#नमस्कार_मित्रों।।।#एक्सपेरिमेंटल।।।कुछ दिन पहले एक मित्र जी से उनकी केतु महादशा के बारे में बातचीत हो रही थी।।उनका #चतुर्थ_भाव_में_केतु था।।केतु की महादशा में उनको बहुत परेशानी फेस होने लगी।।एक दिन वो मच्छली खरीदने मच्छली मार्केट में गये थे।।वहाँ कसाई ने पानी में से एक जिन्दा मच्छली निकाली और उसे काटने लगा।।मित्र जी बोले, रुको भाई इसे जिन्दा ही दे दो।।जो पैसे बनते हैं वो ले लो।।कसाई ने तोल के पैसे बताये तो मित्र जी पॉलीथिन के लिफाफे में पानी भर के उस मच्छली को ले आये और नदी में जिन्दा ही छोड़ दिया।।।मित्र जी ने कहीं पढ़ा था कि मच्छली राहु-केतु से सम्बन्धित जीव है।।उस दिन उनके मन में ये विचार आया था कि इस जीव को ना मारना है ना खाना है।।इसलिए वो जिन्दा मच्छली ले आये थे।।।मच्छली को जिन्दा ही नदी में छोड़ दिया और उस दिन के बाद उनको थोड़ा पॉजिटिव फील हुआ।।अगले हफ्ते मूड बनाकर गये कि अब वैसे ही मच्छली खरीदनी है जो जिन्दा हो और कटने वाली हो।बाल वनिता महिला आश्रम।मच्छली मार्केट में सभी मच्छलियाँ कटनी ही हैं,इसलिए कोई भी जिन्दा मच्छली मिल जाएगी।।।इसके बाद हर हफ्ते वो मच्छली मार्केट जाते और एक जिन्दा मच्छली खरीदकर उसे नदी में छोड़ आते।।उनकी प्रॉब्लम्स काफी ज्यादा सॉल्व हुई।।कुछ टाइम बाद कंडीशन्स ऐसी बनी कि मच्छली मार्केट जाने का समय नहीं बचने लगा क्योंकि काम अच्छे से चलने लगा था।।उन्होंने घर में ही मच्छली का #एक्वेरियम रख लिया और 3-4 मच्छलियाँ पाल ली।।उसके बाद केतू की महादशा में उन्हें काफी अच्छे रिजल्ट्स मिलने लगे।।वो पूजा पाठ भी जारी रखते थे, इसलिए पूजा पाठ का भी इफेक्ट पड़ता है।

#केतु_का_उपाय By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब । । #जिन्दा_मच्छली_कटने_से_बचा_लो। । #नमस्कार_मित्रों। । । #एक्सपेरिमेंटल। । । कुछ दिन पहले एक मित्र जी से उनकी केतु महादशा के बारे में बातचीत हो रही थी। । उनका #चतुर्थ_भाव_में_केतु था। । केतु की महादशा में उनको बहुत परेशानी फेस होने लगी। । एक दिन वो मच्छली खरीदने मच्छली मार्केट में गये थे। । वहाँ कसाई ने पानी में से एक जिन्दा मच्छली निकाली और उसे काटने लगा। । मित्र जी बोले, रुको भाई इसे जिन्दा ही दे दो। । जो पैसे बनते हैं वो ले लो। । कसाई ने तोल के पैसे बताये तो मित्र जी पॉलीथिन के लिफाफे में पानी भर के उस मच्छली को ले आये और नदी में जिन्दा ही छोड़ दिया। । । मित्र जी ने कहीं पढ़ा था कि मच्छली राहु-केतु से सम्बन्धित जीव है। । उस दिन उनके मन में ये विचार आया था कि इस जीव को ना मारना है ना खाना है। । इसलिए वो जिन्दा मच्छली ले आये थे। । । मच्छली को जिन्दा ही नदी में छोड़ दिया और उस दिन के बाद उनको थोड़ा पॉजिटिव फील हुआ। । अगले हफ्ते मूड बनाकर गये कि अब वैसे ही मच्छली खरीदनी है जो जिन्दा हो और कटने वाली हो। बाल वनिता महिला आश्रम । मच्छ...

. * हमारा शुक्र * By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब* लग्न : व्यक्ति अत्यंत बुद्धिमान होगा, विपरीत लिंगी जातक उसकी ओर आकर्षित होंगे, यह शारीरिक श्रम बिल्कुल नहीं करना चाहेगा, यह उत्तम वक्ता, व स्वभाव से कलात्मक होगा, स्त्रियों से लाभ प्राप्त करेगा, इसके जीवन का उद्देश्य ही ऐश्वर्य भोग है* द्वितीय : द्वितीय स्थान गत शुक्र सर्वोत्तम फल प्रदान करता है, जातक मृदुभाषी, विद्वान, संपत्तिवान व धैर्यवान होगा, पैतृक संपत्ति प्राप्त करेगा, यदि शुक्र बली हो तो सुंदर मुखाकृति, मधुर वाणी व दांत भी सुंदर होते हैं, पीड़ित हो तो असमान दंत पंक्ति, कमजोर दृष्टि व पायरिया भी होता है, कन्या व कुंभ लग्न के लिए द्वितीय का शुक्र वरदान है* तृतीय : शुक्र ललित कलाओं में रुझान देता है, व्यक्ति चित्रकार या मूर्तिकार हो सकता है, उच्च हो तो व्यक्ति अत्यंत धनवान होता है, अन्यथा सामान्य भाग्यशाली होता है, रतिक्रिया मेे जातक की रुचि होती है, मंगल से युत हो तो विकृत सोच देता है, पीड़ित शुक्र आंशिक नपुंसकता दे सकता है ऐसे व्यक्ति पर पत्नी का शासन चलता है* चतुर्थ : चतुर्थ स्थान मेे शुक्र समस्त ऐश्वर्य प्रदान करता है, सुंदर व महंगी कार, महंगे कपड़े, सुंदर घर आदि का उपभोग करता है, ऐसा व्यक्ति प्रन्नचित्त, उत्साही व मनोहर व्यक्तित्व का धनी होता है, शिक्षा बैंकिंग से संबंधित हो सकती है* पंचम : पंचम स्थान मेे बली व शुभ शुक्र कन्या संतति, धन, ऐश्वर्य, सुख, वाक कला, प्रतिष्ठा, व्यावसायिक गुण प्रदान करता है, यदि शुभ चन्द्र से संबंध बनाए तो जातक उद्योगपति तथा सरकार से लाभ प्राप्त करता है* षष्ठ : शुक्र यदि षष्ठ स्थान मेे बली हो तो जातक ज्ञानी, बुद्धिमान, उदार व शुभ कर्मों पर व्यय करने वाला होगा, यदि यह दशमेश से युत हो तो ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करेगा, सूर्य या चन्द्र से युत व अशुभ क्रूर दृष्ट हो तो आंखों मेे समस्या देगा, दंत रोग देगा, मंगल से युत हो तो वाहन दुर्घटना देता है* सप्तम : सप्तम स्थान गत शुक्र जातक को यौनाचार में कुशल एवं बहुधा चरित्रहीन बना देता है, यदि शुक्र सप्तम में मंगल की राशि में हो तो जीवन साथी की आयु कम करता है, यदि शुक्र सप्तम में हो और द्वितीय स्थान को क्रूर ग्रह दृष्ट करें तो जातक को एक से अधिक विवाह देता है* अष्टम : अष्टम स्थान का शुक्र सरकारी नौकरी देता है, व्यक्ति आस्तिक होगा, धन संग्रह करेगा तथा जीवन में सुख साधन संपन्न होगा, जातक यात्रा प्रिय होगा, चछती आंत में विकार दे सकता है, यदि पाप प्रभाव मेे हो तो अशुभ फल करेगा* नवम : नवम स्थान मेे शुक्र अत्यंत शुभ होता है, यह ईश्वर भक्ति व गुरु का आदर दर्शाता है, पत्नी व संतान से सुख प्राप्त करता है* दशम : दशम मेे शुक्र यदि शुभ दृष्ट व उच्च हो तो व्यक्ति उच्च अधिकारी बनता है, ऐसे व्यक्ति शिल्पी, डिजाइनर, इंटीरियर डेकोरेटर, रत्न या सौंदर्य से संबंधित वस्तुओं का निर्माण या विक्रय करता है, इनकी रुचि ट्रांसपोर्टेशन मेे भी होती है* एकादश : भोग विलास का कारक शुक्र यदि एकादश स्थान मेे स्थित हो सभी प्रकार के भौतिक सुख, धन, आनंद, सुविधाएं, नौकर आदि प्रदान करेगा तथा स्वभाव मेे श्रेष्ठता देगा* द्वादश : द्वादश स्थान मेे शुक्र अति शुभ होता है, व्यक्ति धनी होने के साथ साथ अपव्ययी नहीं होता है, द्वादश स्थान मेे मीन राशि गत शुक्र सर्वतोमुखी ऐश्वर्य प्रदान करता है, निर्बल शुक्र नेत्र विकार देता है, व्यवसाय के लिए शुभ नहीं होता है, मंगल से संयोग कामवासना के प्रति विकृत सोच देता है** शुक्र यदि निर्बल व पीड़ित हो तो मां दुर्गा की आराधना से अनुकूलता प्राप्त होती है** यह फलादेश काल पुरुष की कुंडली व कारकत्व पर आधारित है, जरूरी नहीं कि आपकी कुंडली पर सत्य हो

. * हमारा शुक्र * By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब * लग्न : व्यक्ति अत्यंत बुद्धिमान होगा, विपरीत लिंगी जातक उसकी ओर आकर्षित होंगे, यह शारीरिक श्रम बिल्कुल नहीं करना चाहेगा, यह उत्तम वक्ता, व स्वभाव से कलात्मक होगा, स्त्रियों से लाभ प्राप्त करेगा, इसके जीवन का उद्देश्य ही ऐश्वर्य भोग है * द्वितीय : द्वितीय स्थान गत शुक्र सर्वोत्तम फल प्रदान करता है, जातक मृदुभाषी, विद्वान, संपत्तिवान व धैर्यवान होगा, पैतृक संपत्ति प्राप्त करेगा, यदि शुक्र बली हो तो सुंदर मुखाकृति, मधुर वाणी व दांत भी सुंदर होते हैं, पीड़ित हो तो असमान दंत पंक्ति, कमजोर दृष्टि व पायरिया भी होता है, कन्या व कुंभ लग्न के लिए द्वितीय का शुक्र वरदान है * तृतीय : शुक्र ललित कलाओं में रुझान देता है, व्यक्ति चित्रकार या मूर्तिकार हो सकता है, उच्च हो तो व्यक्ति अत्यंत धनवान होता है, अन्यथा सामान्य भाग्यशाली होता है, रतिक्रिया मेे जातक की रुचि होती है, मंगल से युत हो तो विकृत सोच देता है, पीड़ित शुक्र आंशिक नपुंसकता दे सकता है ऐसे व्यक्ति पर पत्नी का शासन चलता है * चतुर्थ : चतुर्थ स्थान म...