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कैसे बनाएं दांपत्य जीवन को सुखद, इन उपायों से जानिए ? By वनिता कासनियां पंजाब शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथजीवन में धन-सम्पत्ति, मोटर-कार, बंगला, मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, पत्नी और बच्चे होते हुए भी यदि दाम्पत्य जीवन मधुर न हो तो ऐसा जीवन व्यर्थ ,है। इतना सब कुछ होते हुए भी यदि दाम्पत्य जीवन में क्लेश, घर में अशांति, तनाव भरा माहौल, पारिवारिक सदस्यों के बीच मतभेद और विवाद हों तो ऐसे जीवन को हम कदापि सफल नहीं कह सकते। इस आधुनिक युग की भाग-दौड़ में परेशान व्यक्ति क्या चाहता है? केवल कुछ पलों की शांति, जब वह घर में आए तो सभी परेशानियों को भूल जाए और अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच सुख का कुछ समय बिता सके। दुर्भाग्य की बात है कि यह संतोष सभी को नहीं मिलता। दाम्पत्य सुख में उत्पन्न हो रही बाधाओं को दूर करने के लिए जन्म कुंडली के ग्रह योगानुसार अशुभ ग्रह को शुभ बनाने के उपाय किए जा सकते हैं।सामान्यत: जन्मकुंडली के सप्तम भाव से दांपत्य जीवन का विचार किया जाता है। यदि सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो दाम्पत्य सुख में बाधा आती है। नैसॢगक पापग्रहों में सूर्य, मंगल, शनि, राहू एवं केतू आते हैं।सूर्य का प्रभाव सप्तम भाव पर होने पर जीवनसाथी से स्वाभिमान का टकराव होता है। फलस्वरूप पति-पत्नी के अलग-अलग रहने की स्थितियां बन जाती हैं। ऐसी स्थिति में यदि पति-पत्नी दोनों ही मुंह में पानी भर कर स्नान करें तो दोनों का सामंजस्य बैठने लगता है। ऐसे जातकों को रविवार के दिन लाल वस्त्र पहनने से बचना चाहिए।मंगल को दामपत्य सुख के लिए पीड़ादायक ग्रह माना जाता है क्योंकि मंगल की विवाह के भाव में युती अथवा दृष्टि के कारण विलम्ब, विवाह सम्पन्न होने में अवरोध एवं विवाह के बाद दाम्पत्य जीवन में विवाद होते हैं। मंगल के दुष्प्रभाव के कारण पति-पत्नी में मारपीट एवं हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन नरकतुल्य हो जाता है। गले में चांदी की जंजीर अथवा हाथ में चांदी का ब्रेसलेट धारण किया जा सकता है। पति-पत्नी में से जिसका स्वभाव उग्र हो, उसे मिर्च एवं तीखी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि व्यक्ति मांसाहारी हो, तो उसे शाकाहारी बनना चाहिए।सप्तम भाव पर शनि का दुष्प्रभाव होने पर विवाह में विलम्ब होता है। यदि शनि का अशुभ प्रभाव अधिक हो तो विवाह के बाद भी जीवनसाथी के प्रति उत्साह एवं उमंग की भावना नहीं होती। दाम्पत्य जीवन में परस्पर आकर्षण का अभाव होता है। इस कारण साथ रहते हुए भी पति-पत्नी पृथक रहने के समान जीवन व्यतीत करते हैं।ऐसी स्थिति में शनि के दुष्प्रभाव को शांत करने के लिए व्यक्ति को मंगलवार के दिन नवीन लाल वस्त्र धारण करना चाहिए। पति को लाल वस्त्र खरीद कर पत्नी को भेंट स्वरूप देना चाहिए।सप्तम भाव पर राहू के दुष्प्रभाव के कारण दाम्पत्य जीवन में विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है। पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन में अन्य व्यक्ति की दखल के कारण बाधाएं खड़ी होती हैं। ऐसे जातक का दाम्पत्य जीवन तब तक खराब रहता है जब तक कि वे अन्य व्यक्तियों के परामर्श के अनुसार कार्य करते रहते हैं।यदि जातक नशीली वस्तुओं का सेवन करे तो उसका दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं हो सकता। अत: ऐसे व्यक्ति की सर्वप्रमथ किसी भी प्रकार की नशीली एवं विषैली वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए, जैसे-शराब, अफीम, चरस, धूम्रपान आदि। राहू का दुष्प्रभाव अधिक होने पर दाम्पत्य जीवन में गाली-गलौच, अपशब्द का प्रयोग होता है। पति-पपत्नी एक-दूसरे की निंदा एवं आलोचना करते हैं। अत: दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए अपने जीवनसाथी की प्रशंसा करनी चाहिए। -Vnita Kasnia Punjab

कैसे बनाएं दांपत्य जीवन को सुखद, इन उपायों से जानिए ?


 
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    शास्त्रों की बातजानें धर्म के साथ

    जीवन में धन-सम्पत्ति, मोटर-कार, बंगला, मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, पत्नी और बच्चे होते हुए भी यदि दाम्पत्य जीवन मधुर न हो तो ऐसा जीवन व्यर्थ है। इतना सब कुछ होते हुए भी यदि दाम्पत्य जीवन में क्लेश, घर में अशांति, तनाव भरा माहौल, पारिवारिक सदस्यों के बीच मतभेद और विवाद हों तो ऐसे जीवन को हम कदापि सफल नहीं कह सकते। इस आधुनिक युग की भाग-दौड़ में परेशान व्यक्ति क्या चाहता है? केवल कुछ पलों की शांति, जब वह घर में आए तो सभी परेशानियों को भूल जाए और अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच सुख का कुछ समय बिता सके। दुर्भाग्य की बात है कि यह संतोष सभी को नहीं मिलता। दाम्पत्य सुख में उत्पन्न हो रही बाधाओं को दूर करने के लिए जन्म कुंडली के ग्रह योगानुसार अशुभ ग्रह को शुभ बनाने के उपाय किए जा सकते हैं।


    सामान्यत: जन्मकुंडली के सप्तम भाव से दांपत्य जीवन का विचार किया जाता है। यदि सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो दाम्पत्य सुख में बाधा आती है। नैसॢगक पापग्रहों में सूर्य, मंगल, शनि, राहू एवं केतू आते हैं।


    सूर्य का प्रभाव सप्तम भाव पर होने पर जीवनसाथी से स्वाभिमान का टकराव होता है। फलस्वरूप पति-पत्नी के अलग-अलग रहने की स्थितियां बन जाती हैं। ऐसी स्थिति में यदि पति-पत्नी दोनों ही मुंह में पानी भर कर स्नान करें तो दोनों का सामंजस्य बैठने लगता है। ऐसे जातकों को रविवार के दिन लाल वस्त्र पहनने से बचना चाहिए।


    मंगल को दामपत्य सुख के लिए पीड़ादायक ग्रह माना जाता है क्योंकि मंगल की विवाह के भाव में युती अथवा दृष्टि के कारण विलम्ब, विवाह सम्पन्न होने में अवरोध एवं विवाह के बाद दाम्पत्य जीवन में विवाद होते हैं। मंगल के दुष्प्रभाव के कारण पति-पत्नी में मारपीट एवं हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन नरकतुल्य हो जाता है। गले में चांदी की जंजीर अथवा हाथ में चांदी का ब्रेसलेट धारण किया जा सकता है। पति-पत्नी में से जिसका स्वभाव उग्र हो, उसे मिर्च एवं तीखी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि व्यक्ति मांसाहारी हो, तो उसे शाकाहारी बनना चाहिए।


    सप्तम भाव पर शनि का दुष्प्रभाव होने पर विवाह में विलम्ब होता है। यदि शनि का अशुभ प्रभाव अधिक हो तो विवाह के बाद भी जीवनसाथी के प्रति उत्साह एवं उमंग की भावना नहीं होती। दाम्पत्य जीवन में परस्पर आकर्षण का अभाव होता है। इस कारण साथ रहते हुए भी पति-पत्नी पृथक रहने के समान जीवन व्यतीत करते हैं।


    ऐसी स्थिति में शनि के दुष्प्रभाव को शांत करने के लिए व्यक्ति को मंगलवार के दिन नवीन लाल वस्त्र धारण करना चाहिए। पति को लाल वस्त्र खरीद कर पत्नी को भेंट स्वरूप देना चाहिए।


    सप्तम भाव पर राहू के दुष्प्रभाव के कारण दाम्पत्य जीवन में विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है। पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन में अन्य व्यक्ति की दखल के कारण बाधाएं खड़ी होती हैं। ऐसे जातक का दाम्पत्य जीवन तब तक खराब रहता है जब तक कि वे अन्य व्यक्तियों के परामर्श के अनुसार कार्य करते रहते हैं।


    यदि जातक नशीली वस्तुओं का सेवन करे तो उसका दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं हो सकता। अत: ऐसे व्यक्ति की सर्वप्रमथ किसी भी प्रकार की नशीली एवं विषैली वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए, जैसे-शराब, अफीम, चरस, धूम्रपान आदि। राहू का दुष्प्रभाव अधिक होने पर दाम्पत्य जीवन में गाली-गलौच, अपशब्द का प्रयोग होता है। पति-पपत्नी एक-दूसरे की निंदा एवं आलोचना करते हैं। अत: दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए अपने जीवनसाथी की प्रशंसा करनी चाहिए। -Vnita Kasnia Punjab 

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चन्द्रमा का सप्तम भाव में फल ) तथा शुक्र ( Venus) का लग्न या सप्तम में होना भी प्रेम विवाह की ओर संकेत करता है।उदाहरण कुंडली से प्रेम विवाह के ज्योतिषीय कारण को समझा जा सकता है।जन्म की तारीख- 12 अप्रैल 1985, जन्म का समय- 13:00, जन्म का स्थान– दिल्ली, लिंग- महिलाप्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत Astrological theory of Love Marriageप्रस्तुत जन्म कुंडली कर्क लग्न की है। इस कुंडली में विवाह भाव सप्तम का स्वामी शनि प्रेम भाव पंचम में चला गया है और वहां से शनि तीसरी दृष्टि से अपने ही घर सप्तम को देख भी रहा है इस प्रकार यहां पंचम और सप्तम भाव से सीधा सम्बन्ध बन रहा है अतः स्पष्ट है कि प्रेम विवाह होगा।लग्नेश चन्द्रमा तथा नवमेश गुरू दोनों की युति सप्तम स्थान में है तथा सप्तमेश शनि भी देख रहा है। इस प्रकार यहाँ लग्न, पंचम, सप्तम तथा नवम का सीधा सम्बन्ध बन रहा है। यही कारण है कि जातक का विवाह प्रेम-विवाह हुआ।नाम- इंदिरा गांधी, जन्म तारीख- 19 नवम्बर 1917, जन्म समय- 22:11:00,जन्म स्थान- ईलाहाबाद, उत्तरप्रदेश प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत | Astrological theory of Love Marriage-minप्रस्तुत जन्म कुंडली इंदिरा गांधी(Indira Gandhi) की है। सभी जानते है कि इनका प्रेम-विवाह(Love Marriage) हुआ था। यह कर्क लग्न की कुंडली है। इस कुंडली में विवाह भाव सप्तम का स्वामी शनि की लग्न में युति तथा लग्नेश चन्द्रमा की सप्तम भाव में युति तथा परस्पर सप्तम से दृष्टि देखना प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत को पुष्ट करता है।नवमेश गुरु लाभ स्थान में बैठकर पंचम भाव तथा सप्तम भाव एवं लग्नेश को भी देख रहा है। वहीँ वक्री होकर सप्तमेश को भी देख रहा है जो की प्रेम-विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत को 100 प्रतिशत पुष्ट करता है।प्रेम और विवाह के कारक ग्रह शुक्र या मंगल का पंचम तथा सप्तम भाव-भावेश के साथ सम्बन्ध होना भी विवाह कराने में सक्षम होता है।सभी भावो में नवम भाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है नवम भाव का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सम्बन्ध होने पर माता-पिता का आशीर्वाद मिलता है और यही कारण है की नवम भाव -भावेश का पंचम- सप्तम भाव भावेश से सम्बन्ध बनता है तो विवाह भागकर या गुप्त रूप से न होकर सामाजिक और पारिवारिक रीति-रिवाजो से होती है।शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है।नवमांश कुण्डली जन्म कुण्डली का सूक्ष्म शरीर माना जाता है अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है या आंशिक है और नवमांश कुण्डली में पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल हो जाती है।पाप ग्रहो का सप्तम भाव-भावेश से युति हो तो प्रेम विवाह की सम्भावना बन जाती है। राहु और केतु का सम्बन्ध लग्न या सप्तम भाव-भावेश से हो तो प्रेम विवाह का सम्बन्ध बनता है।लग्नेश तथा सप्तमेश का परिवर्तन योग या केवल सप्तमेश का लग्न में होना या लग्नेश का सप्तम में होना भी प्रेम विवाह करा देता है।चन्द्रमा ( जाने ! चन्द्रमा का सप्तम भाव में फल ) तथा शुक्र ( Venus) का लग्न या सप्तम में होना भी प्रेम विवाह की ओर संकेत करता है।

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    #केतु_का_उपाय By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब।।#जिन्दा_मच्छली_कटने_से_बचा_लो।।#नमस्कार_मित्रों।।।#एक्सपेरिमेंटल।।।कुछ दिन पहले एक मित्र जी से उनकी केतु महादशा के बारे में बातचीत हो रही थी।।उनका #चतुर्थ_भाव_में_केतु था।।केतु की महादशा में उनको बहुत परेशानी फेस होने लगी।।एक दिन वो मच्छली खरीदने मच्छली मार्केट में गये थे।।वहाँ कसाई ने पानी में से एक जिन्दा मच्छली निकाली और उसे काटने लगा।।मित्र जी बोले, रुको भाई इसे जिन्दा ही दे दो।।जो पैसे बनते हैं वो ले लो।।कसाई ने तोल के पैसे बताये तो मित्र जी पॉलीथिन के लिफाफे में पानी भर के उस मच्छली को ले आये और नदी में जिन्दा ही छोड़ दिया।।।मित्र जी ने कहीं पढ़ा था कि मच्छली राहु-केतु से सम्बन्धित जीव है।।उस दिन उनके मन में ये विचार आया था कि इस जीव को ना मारना है ना खाना है।।इसलिए वो जिन्दा मच्छली ले आये थे।।।मच्छली को जिन्दा ही नदी में छोड़ दिया और उस दिन के बाद उनको थोड़ा पॉजिटिव फील हुआ।।अगले हफ्ते मूड बनाकर गये कि अब वैसे ही मच्छली खरीदनी है जो जिन्दा हो और कटने वाली हो।बाल वनिता महिला आश्रम।मच्छली मार्केट में सभी मच्छलियाँ कटनी ही हैं,इसलिए कोई भी जिन्दा मच्छली मिल जाएगी।।।इसके बाद हर हफ्ते वो मच्छली मार्केट जाते और एक जिन्दा मच्छली खरीदकर उसे नदी में छोड़ आते।।उनकी प्रॉब्लम्स काफी ज्यादा सॉल्व हुई।।कुछ टाइम बाद कंडीशन्स ऐसी बनी कि मच्छली मार्केट जाने का समय नहीं बचने लगा क्योंकि काम अच्छे से चलने लगा था।।उन्होंने घर में ही मच्छली का #एक्वेरियम रख लिया और 3-4 मच्छलियाँ पाल ली।।उसके बाद केतू की महादशा में उन्हें काफी अच्छे रिजल्ट्स मिलने लगे।।वो पूजा पाठ भी जारी रखते थे, इसलिए पूजा पाठ का भी इफेक्ट पड़ता है।

    #केतु_का_उपाय By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब । । #जिन्दा_मच्छली_कटने_से_बचा_लो। । #नमस्कार_मित्रों। । । #एक्सपेरिमेंटल। । । कुछ दिन पहले एक मित्र जी से उनकी केतु महादशा के बारे में बातचीत हो रही थी। । उनका #चतुर्थ_भाव_में_केतु था। । केतु की महादशा में उनको बहुत परेशानी फेस होने लगी। । एक दिन वो मच्छली खरीदने मच्छली मार्केट में गये थे। । वहाँ कसाई ने पानी में से एक जिन्दा मच्छली निकाली और उसे काटने लगा। । मित्र जी बोले, रुको भाई इसे जिन्दा ही दे दो। । जो पैसे बनते हैं वो ले लो। । कसाई ने तोल के पैसे बताये तो मित्र जी पॉलीथिन के लिफाफे में पानी भर के उस मच्छली को ले आये और नदी में जिन्दा ही छोड़ दिया। । । मित्र जी ने कहीं पढ़ा था कि मच्छली राहु-केतु से सम्बन्धित जीव है। । उस दिन उनके मन में ये विचार आया था कि इस जीव को ना मारना है ना खाना है। । इसलिए वो जिन्दा मच्छली ले आये थे। । । मच्छली को जिन्दा ही नदी में छोड़ दिया और उस दिन के बाद उनको थोड़ा पॉजिटिव फील हुआ। । अगले हफ्ते मूड बनाकर गये कि अब वैसे ही मच्छली खरीदनी है जो जिन्दा हो और कटने वाली हो। बाल वनिता महिला आश्रम । मच्छ...

    . * हमारा शुक्र * By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब* लग्न : व्यक्ति अत्यंत बुद्धिमान होगा, विपरीत लिंगी जातक उसकी ओर आकर्षित होंगे, यह शारीरिक श्रम बिल्कुल नहीं करना चाहेगा, यह उत्तम वक्ता, व स्वभाव से कलात्मक होगा, स्त्रियों से लाभ प्राप्त करेगा, इसके जीवन का उद्देश्य ही ऐश्वर्य भोग है* द्वितीय : द्वितीय स्थान गत शुक्र सर्वोत्तम फल प्रदान करता है, जातक मृदुभाषी, विद्वान, संपत्तिवान व धैर्यवान होगा, पैतृक संपत्ति प्राप्त करेगा, यदि शुक्र बली हो तो सुंदर मुखाकृति, मधुर वाणी व दांत भी सुंदर होते हैं, पीड़ित हो तो असमान दंत पंक्ति, कमजोर दृष्टि व पायरिया भी होता है, कन्या व कुंभ लग्न के लिए द्वितीय का शुक्र वरदान है* तृतीय : शुक्र ललित कलाओं में रुझान देता है, व्यक्ति चित्रकार या मूर्तिकार हो सकता है, उच्च हो तो व्यक्ति अत्यंत धनवान होता है, अन्यथा सामान्य भाग्यशाली होता है, रतिक्रिया मेे जातक की रुचि होती है, मंगल से युत हो तो विकृत सोच देता है, पीड़ित शुक्र आंशिक नपुंसकता दे सकता है ऐसे व्यक्ति पर पत्नी का शासन चलता है* चतुर्थ : चतुर्थ स्थान मेे शुक्र समस्त ऐश्वर्य प्रदान करता है, सुंदर व महंगी कार, महंगे कपड़े, सुंदर घर आदि का उपभोग करता है, ऐसा व्यक्ति प्रन्नचित्त, उत्साही व मनोहर व्यक्तित्व का धनी होता है, शिक्षा बैंकिंग से संबंधित हो सकती है* पंचम : पंचम स्थान मेे बली व शुभ शुक्र कन्या संतति, धन, ऐश्वर्य, सुख, वाक कला, प्रतिष्ठा, व्यावसायिक गुण प्रदान करता है, यदि शुभ चन्द्र से संबंध बनाए तो जातक उद्योगपति तथा सरकार से लाभ प्राप्त करता है* षष्ठ : शुक्र यदि षष्ठ स्थान मेे बली हो तो जातक ज्ञानी, बुद्धिमान, उदार व शुभ कर्मों पर व्यय करने वाला होगा, यदि यह दशमेश से युत हो तो ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करेगा, सूर्य या चन्द्र से युत व अशुभ क्रूर दृष्ट हो तो आंखों मेे समस्या देगा, दंत रोग देगा, मंगल से युत हो तो वाहन दुर्घटना देता है* सप्तम : सप्तम स्थान गत शुक्र जातक को यौनाचार में कुशल एवं बहुधा चरित्रहीन बना देता है, यदि शुक्र सप्तम में मंगल की राशि में हो तो जीवन साथी की आयु कम करता है, यदि शुक्र सप्तम में हो और द्वितीय स्थान को क्रूर ग्रह दृष्ट करें तो जातक को एक से अधिक विवाह देता है* अष्टम : अष्टम स्थान का शुक्र सरकारी नौकरी देता है, व्यक्ति आस्तिक होगा, धन संग्रह करेगा तथा जीवन में सुख साधन संपन्न होगा, जातक यात्रा प्रिय होगा, चछती आंत में विकार दे सकता है, यदि पाप प्रभाव मेे हो तो अशुभ फल करेगा* नवम : नवम स्थान मेे शुक्र अत्यंत शुभ होता है, यह ईश्वर भक्ति व गुरु का आदर दर्शाता है, पत्नी व संतान से सुख प्राप्त करता है* दशम : दशम मेे शुक्र यदि शुभ दृष्ट व उच्च हो तो व्यक्ति उच्च अधिकारी बनता है, ऐसे व्यक्ति शिल्पी, डिजाइनर, इंटीरियर डेकोरेटर, रत्न या सौंदर्य से संबंधित वस्तुओं का निर्माण या विक्रय करता है, इनकी रुचि ट्रांसपोर्टेशन मेे भी होती है* एकादश : भोग विलास का कारक शुक्र यदि एकादश स्थान मेे स्थित हो सभी प्रकार के भौतिक सुख, धन, आनंद, सुविधाएं, नौकर आदि प्रदान करेगा तथा स्वभाव मेे श्रेष्ठता देगा* द्वादश : द्वादश स्थान मेे शुक्र अति शुभ होता है, व्यक्ति धनी होने के साथ साथ अपव्ययी नहीं होता है, द्वादश स्थान मेे मीन राशि गत शुक्र सर्वतोमुखी ऐश्वर्य प्रदान करता है, निर्बल शुक्र नेत्र विकार देता है, व्यवसाय के लिए शुभ नहीं होता है, मंगल से संयोग कामवासना के प्रति विकृत सोच देता है** शुक्र यदि निर्बल व पीड़ित हो तो मां दुर्गा की आराधना से अनुकूलता प्राप्त होती है** यह फलादेश काल पुरुष की कुंडली व कारकत्व पर आधारित है, जरूरी नहीं कि आपकी कुंडली पर सत्य हो

    . * हमारा शुक्र * By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब * लग्न : व्यक्ति अत्यंत बुद्धिमान होगा, विपरीत लिंगी जातक उसकी ओर आकर्षित होंगे, यह शारीरिक श्रम बिल्कुल नहीं करना चाहेगा, यह उत्तम वक्ता, व स्वभाव से कलात्मक होगा, स्त्रियों से लाभ प्राप्त करेगा, इसके जीवन का उद्देश्य ही ऐश्वर्य भोग है * द्वितीय : द्वितीय स्थान गत शुक्र सर्वोत्तम फल प्रदान करता है, जातक मृदुभाषी, विद्वान, संपत्तिवान व धैर्यवान होगा, पैतृक संपत्ति प्राप्त करेगा, यदि शुक्र बली हो तो सुंदर मुखाकृति, मधुर वाणी व दांत भी सुंदर होते हैं, पीड़ित हो तो असमान दंत पंक्ति, कमजोर दृष्टि व पायरिया भी होता है, कन्या व कुंभ लग्न के लिए द्वितीय का शुक्र वरदान है * तृतीय : शुक्र ललित कलाओं में रुझान देता है, व्यक्ति चित्रकार या मूर्तिकार हो सकता है, उच्च हो तो व्यक्ति अत्यंत धनवान होता है, अन्यथा सामान्य भाग्यशाली होता है, रतिक्रिया मेे जातक की रुचि होती है, मंगल से युत हो तो विकृत सोच देता है, पीड़ित शुक्र आंशिक नपुंसकता दे सकता है ऐसे व्यक्ति पर पत्नी का शासन चलता है * चतुर्थ : चतुर्थ स्थान म...