सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्रीमद्देवीभागवत (पाँचवा स्कन्ध) By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️अध्याय 5 (भाग 1)॥श्रीभगवत्यै नमः ॥बृहस्पतिजी का इन्द्र के प्रति उपदेश, इन्द्र का भगवान् ब्रह्मा, शंकर तथा विष्णु के पास जाना...〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️बृहस्पति जी आगे बोले- हर्ष और शोक शत्रुतुल्य हैं। इन्हें अपने आत्मा को न सौंपे। विवेकी पुरुषों को चाहिये कि इनके उपस्थित होने पर धैर्य का ही अनुसरण करें। अधीर हो जाने पर दुःख का जैसा भयंकर रूप सामने दिखायी पड़ता है, वैसा धैर्य धारण करने पर नहीं दीखता। परंतु दुःख और सुख के सामने आने पर सहनशील बने रहना अवश्य ही दुर्लभ है। जो पुरुष हर्ष और शोक की अवस्था में अपनी सद्बुद्धि से निश्चय करके उनके प्रभाव से प्रभावित नहीं होता, उसके लिये कैसा सुख और कैसा दुःख। वैसी परिस्थिति में वह यह सोचे कि 'मैं निर्गुण हूँ', मेरा कभी नाश नहीं हो सकता। मैं इन चौबीस गुणों से पृथक् हूँ। फिर मुझे दुःख और सुख से क्या प्रयोजन ? भूख और प्यास का प्राण से, शोक और मोह का मन से तथा जरा और मृत्यु का शरीर से सम्बन्ध है । मैं इन छहों ऊर्मियों से रहित कल्याण स्वरूप हूँ। शोक और मोह- ये शरीर के गुण हैं। मैं इनकी चिन्ता में क्यों उलझँ। मैं शरीर नहीं हूँ और न मेरा इससे कोई स्थायी सम्बन्ध ही है। मेरा स्वरूप अखण्ड आनन्दमय है। प्रकृति और विकृति मेरे इस आनन्दमय स्वरूप से पृथक् हैं। फिर मेरा कभी भी दुःख से क्या सम्बन्ध है।' देवराज! तुम सच्चे मन से इस रहस्य को भलीभाँति समझकर ममता रहित हो जाओ। शतक्रतो! तुम्हारे दुःख के अभाव का सर्वप्रथम उपाय यही है। ममता ही परम दुःख है और निर्ममत्व - ममता का अभाव हो जाना परम सुख का साधन है। शचीपते! कोई सुखी होना चाहे तो संतोष का आश्रय ले। संतोष के अतिरिक्त सुख का स्थान और कोई नहीं है। * अथवा देवराज! यदि तुम्हारे पास ममता दूर करने वाले ज्ञान का नितान्त अभाव हो तो प्रारब्ध के विषय में विवेक का आश्रय लेना परम आवश्यक है। प्रारब्ध कर्मों का अभाव बिना भोगे नहीं हो सकता - यह स्पष्ट है। आर्य! सम्पूर्ण देवता तुम्हारे सहायक हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान् हो। फिर भी जो होनी है, वह होकर ही रहेगी। तुम उसे टाल नहीं सकते। ऐसी स्थिति में सुख और दुःख की चिन्ता में नहीं पड़ना चाहिये। महाभाग ! सुख और दुःख – ये दोनों क्रमश: पुण्य एवं पाप के क्षय के सूचक हैं। अतएव विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि सुख के अभाव में भी सर्वथा आनन्द का ही अनुभव । अतएव महाराज! इस अवसर पर सुयोग्य करें। मन्त्रियों से परामर्श लेकर विधिपूर्वक यत्न करने में कटिबद्ध हो जाओ। यत्न करने पर भी, जो होनहार होगा, वह तो सामने आयेगा ही।बाल वनिता महिला आश्रमक्रमश...शेष अगले अंक मेंजय माता जी की〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

श्रीमद्देवीभागवत (पाँचवा स्कन्ध)  
By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब
〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️
अध्याय 5 (भाग 1)

॥श्रीभगवत्यै नमः ॥

बृहस्पतिजी का इन्द्र के प्रति उपदेश, इन्द्र का भगवान् ब्रह्मा, शंकर तथा विष्णु के पास जाना...
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
बृहस्पति जी आगे बोले- हर्ष और शोक शत्रुतुल्य हैं। इन्हें अपने आत्मा को न सौंपे। विवेकी पुरुषों को चाहिये कि इनके उपस्थित होने पर धैर्य का ही अनुसरण करें। अधीर हो जाने पर दुःख का जैसा भयंकर रूप सामने दिखायी पड़ता है, वैसा धैर्य धारण करने पर नहीं दीखता। परंतु दुःख और सुख के सामने आने पर सहनशील बने रहना अवश्य ही दुर्लभ है। जो पुरुष हर्ष और शोक की अवस्था में अपनी सद्बुद्धि से निश्चय करके उनके प्रभाव से प्रभावित नहीं होता, उसके लिये कैसा सुख और कैसा दुःख। वैसी परिस्थिति में वह यह सोचे कि 'मैं निर्गुण हूँ', मेरा कभी नाश नहीं हो सकता। मैं इन चौबीस गुणों से पृथक् हूँ। फिर मुझे दुःख और सुख से क्या प्रयोजन ? भूख और प्यास का प्राण से, शोक और मोह का मन से तथा जरा और मृत्यु का शरीर से सम्बन्ध है । मैं इन छहों ऊर्मियों से रहित कल्याण स्वरूप हूँ। शोक और मोह- ये शरीर के गुण हैं। मैं इनकी चिन्ता में क्यों उलझँ। मैं शरीर नहीं हूँ और न मेरा इससे कोई स्थायी सम्बन्ध ही है। मेरा स्वरूप अखण्ड आनन्दमय है। प्रकृति और विकृति मेरे इस आनन्दमय स्वरूप से पृथक् हैं। फिर मेरा कभी भी दुःख से क्या सम्बन्ध है।' देवराज! तुम सच्चे मन से इस रहस्य को भलीभाँति समझकर ममता रहित हो जाओ। शतक्रतो! तुम्हारे दुःख के अभाव का सर्वप्रथम उपाय यही है। ममता ही परम दुःख है और निर्ममत्व - ममता का अभाव हो जाना परम सुख का साधन है। शचीपते! कोई सुखी होना चाहे तो संतोष का आश्रय ले। संतोष के अतिरिक्त सुख का स्थान और कोई नहीं है। * अथवा देवराज! यदि तुम्हारे पास ममता दूर करने वाले ज्ञान का नितान्त अभाव हो तो प्रारब्ध के विषय में विवेक का आश्रय लेना परम आवश्यक है। प्रारब्ध कर्मों का अभाव बिना भोगे नहीं हो सकता - यह स्पष्ट है। आर्य! सम्पूर्ण देवता तुम्हारे सहायक हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान् हो। फिर भी जो होनी है, वह होकर ही रहेगी। तुम उसे टाल नहीं सकते। ऐसी स्थिति में सुख और दुःख की चिन्ता में नहीं पड़ना चाहिये। महाभाग ! सुख और दुःख – ये दोनों क्रमश: पुण्य एवं पाप के क्षय के सूचक हैं। अतएव विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि सुख के अभाव में भी सर्वथा आनन्द का ही अनुभव । अतएव महाराज! इस अवसर पर सुयोग्य करें। मन्त्रियों से परामर्श लेकर विधिपूर्वक यत्न करने में कटिबद्ध हो जाओ। यत्न करने पर भी, जो होनहार होगा, वह तो सामने आयेगा ही।
क्रमश...
शेष अगले अंक में
जय माता जी की
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

क्या आप कर्म की साइकोलाजी के बारे में बता सकते हैं ?By वनिता कासनियां पंजाबआज मैं आपको बताऊंगी कि कर्म की साइकोलाजी क्या होती हैं :-1 हम जिस किसी के साथ भी जैसा कर्म करते हैं वैसे ही वापस हमारे साथ भी होता हैं चाहे वो अच्छा कर्म हो या बुरा कर्म।2.यह सृष्टि का नियम हैं जीवन अपने आप नहीं बनता ,जीवन हमे खुद को बनाना पड़ता हैं वो भी खुद कठोर मेहनत और अच्छे कर्म करके।🌄🌺3.जब हम सवंयम को बदलते है तो हमारा जीवन भी उसी के अनुसार चलता है और बदल जाता है ।इसलिए खुद में अच्छी आदते डाले बुरी आदत नहीं ।🌝4.हमें अपने जीवन मे जो कुछ भी हो उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए । हमे अपनी जिम्मेदारीयों से पीछा नहीं छोड़ना अब चाहे वो सफलता की हो या असफलता की। 🙋🙍5.अगर आपने भूतकाल में किसी के साथ अच्छा काम किया हैं तो उसका फल आपको वर्तमान में मिलेगा,अगर आप वर्तमान में किसी के साथ बुरा करते हैं तो उसका फल आपको भविष्य में मिलेगा।🌺😢🌝6.हमारी करनी और कथनी दोनों मेल खानी चाहिए नहीं तो हम बाहर से कुछ ओर और अंदर से कुछ ।😶😟7.कर्म का एक और नियम हैं मेहनत करते रहिए इसका फल आपको एक ना एक दिन जरूर मिलेगा 👮किसी को पहले मिलता तो किसी को बाद में मिलता लेकिन मिलता जरूर हैं।8.कुछ लोग कहते कि मेरी किस्मत में होगा तो मुझे मिलेगा लेकिन जनाब जब तक आप उस चीज के लिए कर्म नहीं करेंगे तब तक वह आपको नही मिलेगी ।बैठे बैठे तो वह चीजआपको नही मिलने वाली उसके लिए आपको कर्म तो करना पड़ेगा। गीता में श्री कृष्ण जी ने भी कहा कर्म कर फल की चिंता मत कर। 🙏9.कुछ लोग अच्छे कर्म करते हैं और कुछ लोग बुरे कर्म तो आप मुझे कमेंट में बताइए कि क्या आप अच्छे कर्म में विशवास रखते हैंमैं आशा करती हूं कि आपको मेरी यह पोस्ट पंसद आई होगी ।🤗🙏अगर आपको यह मेरी पोस्ट पंसद आई है तो इसे अपवोट करे और मुझे फोलो करना ना भूल। ⬆️👍Can you explain the psychology of karma?By Vnita Kasnia PunjabToday I will tell you what is the psychology of karma:-1 With whomever we do, the same kind of karma we do back to us.

क्या आप कर्म की साइकोलाजी के बारे में बता सकते हैं ? By वनिता कासनियां पंजाब आज मैं आपको बताऊंगी कि कर्म की साइकोलाजी क्या होती हैं :-1 हम जिस किसी के साथ भी जैसा कर्म करते हैं वैसे ही वापस हमारे साथ भी होता हैं चाहे वो अच्छा कर्म हो या बुरा कर्म। 2.यह सृष्टि का नियम हैं जीवन अपने आप नहीं बनता ,जीवन हमे खुद को बनाना पड़ता हैं वो भी खुद कठोर मेहनत और अच्छे कर्म करके।🌄🌺 3.जब हम सवंयम को बदलते है तो हमारा जीवन भी उसी के अनुसार चलता है और बदल जाता है ।इसलिए खुद में अच्छी आदते डाले बुरी आदत नहीं ।🌝 4.हमें अपने जीवन मे जो कुछ भी हो उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए । हमे अपनी जिम्मेदारीयों से पीछा नहीं छोड़ना अब चाहे वो सफलता की हो या असफलता की। 🙋🙍 5.अगर आपने भूतकाल में किसी के साथ अच्छा काम किया हैं तो उसका फल आपको वर्तमान में मिलेगा,अगर आप वर्तमान में किसी के साथ बुरा करते हैं तो उसका फल आपको भविष्य में मिलेगा।🌺😢🌝 6.हमारी करनी और कथनी दोनों मेल खानी चाहिए नहीं तो हम बाहर से कुछ ओर और अंदर से कुछ ।😶😟 7.कर्म का एक और नियम हैं मेहनत करते रहिए इसका फल आपको एक ना एक दिन जरूर मिलेगा 👮किसी को...

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ? दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी!By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबएक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) की यात्रा पर निकला। पहले के ज़माने में यातायात सुविधाएँ ना होने के कारण, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में उसे जो भी मिलता उससे केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता और मन में भगवान शिव (Shiv) का ध्यान करता रहता। चलते-चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदारनाथ धाम (Kedarnath Temple) पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। उसने पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर मुझे प्रभु के दर्शन करवा दीजिये। लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद और नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवान शिव को याद किया, कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह सभी से प्रार्थना कर रहा था, लेकिन किसी ने भी उसकी एक नही सुनी।पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। यह कह कर सभी वहा से चले गये। लेकिन वह वहीं पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी और चारों तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे अपने शिव पर पूरा विश्वाश था, कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। तभी उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आकर बैठ गया। पूछा – बेटा कहाँ से आये हो ? उसने अपना सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा यहाँ आना व्यर्थ हो गया बाबा जी। सन्यासी बाबा ने उसे समझाया, खाना भी दिया और बहुत देर तक उससे बाते करते रहे। सन्यासी बाबा को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।इन्ही बातों-बातों में उस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी अपनी पूरी मंडली के साथ आ रहे है। उसने पंडित को प्रणाम किया और बोला – कल तो आप ने कहा था, कि अब मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई यहाँ पर नहीं आएगा, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा – तुम वही हो ना जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे और मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! भक्त ने आश्चर्य से कहा – नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे रात में, मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया।Kedarnath-MahadevKedarnath-Mahadevपंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कहा – लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी, कि एक सन्यासी मंदिर के पट बंद होने के बाद यहाँ आया था – लम्बा, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए और मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते हैं!

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ? दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी! By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) की यात्रा पर निकला। पहले के ज़माने में यातायात सुविधाएँ ना होने के कारण, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में उसे जो भी मिलता उससे केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता और मन में भगवान शिव (Shiv) का ध्यान करता रहता। चलते-चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदारनाथ धाम (Kedarnath Temple) पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। उसने पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर मुझे प्रभु के दर्शन करवा दीजिये। लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद और नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवान शिव को याद किया, कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह सभी से प्रार्थना कर रहा था, लेकिन किसी ने भी उसकी एक नही सुनी। पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आन...
श्रीसूक्त पाठ विधि By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब 🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶 धन की कामना के लिए दीपावली पूजन के साथ श्री सूक्त का पाठ अत्यन्त लाभकारी रहता है। (श्रीसूक्त के इस प्रयोग को हृदय अथवा आज्ञा चक्र में करने से सर्वोत्तम लाभ होगा, अन्यथा सामान्य पूजा प्रकरण से ही संपन्न करें .) प्राणायाम आचमन आदि कर आसन पूजन करें :- ॐ अस्य श्री आसन पूजन महामन्त्रस्य कूर्मो देवता मेरूपृष्ठ ऋषि पृथ्वी सुतलं छंद: आसन पूजने विनियोग: । विनियोग हेतु जल भूमि पर गिरा दें । पृथ्वी पर रोली से त्रिकोण का निर्माण कर इस मन्त्र से पंचोपचार पूजन करें – ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुनां धृता त्वां च धारय मां देवी पवित्रां कुरू च आसनं ।ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मासनायै नम: । ॐ पद्‌मासनायै नम: । ॐ सिद्धासनाय नम: । ॐ साध्य सिद्धसिद्धासनाय नम: । तदुपरांत गुरू गणपति गौरी पित्र व स्थान देवता आदि का स्मरण व पंचोपचार पूजन कर श्री चक्र के सम्मुख पुरुष सूक्त का एक बार पाठ करें । निम्न मन्त्रों से करन्यास करें :- 🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶 1 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अंगुष्ठाभ्याम नमः । 2 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क...